बैंकिंग सेक्टर ने FY26 में रचा इतिहास

कर्ज 16% बढ़ा, जमा ने भी तोड़े रिकॉर्ड

वित्त वर्ष 2025-26 भारतीय बैंकिंग के लिए एक यादगार साल रहा। बैंकों ने न सिर्फ कर्ज देने में तेजी दिखाई, बल्कि जमा राशि भी नई ऊंचाई पर पहुंची। रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि यह ग्रोथ पिछले दो साल में सबसे तेज रही। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे कुछ जरूरी सवाल भी हैं, जो आगे की राह तय करेंगे। FY26 में बैंकिंग सेक्टर की बड़ी तस्वीर
31 मार्च 2026 को वित्त वर्ष की समाप्ति पर भारतीय बैंकिंग क्षेत्र मजबूत स्थिति में नजर आया। बैंकों का कुल कर्ज करीब 16 प्रतिशत बढ़कर लगभग 219 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जबकि कुल जमा राशि करीब 13.4 प्रतिशत की बढ़त के साथ 267.8 लाख करोड़ रुपये हो गई। बैंकों का निवेश भी करीब 4.7 प्रतिशत बढ़कर 71.4 लाख करोड़ रुपये रहा। खास बात यह रही कि साल के आखिरी पखवाड़े में ही बैंकों ने करीब 12 लाख करोड़ रुपये की जमा जुटाई और 6.1 लाख करोड़ रुपये के कर्ज बांटे। यह साल के अंत में होने वाली उस सामान्य हलचल का हिस्सा है जब कंपनियां अपना फालतू पैसा बैंक में जमा करती हैं, सरकार खर्च बढ़ाती है और बैंक भी साल पूरा करने की जल्दी में होते हैं।
क्रेडिट ग्रोथ तेज क्यों रही?
FY26 में कर्ज की रफ्तार जून 2024 के बाद सबसे तेज रही। इसके पीछे कई कारण एक साथ काम करते नजर आए। पहला, बड़ी कंपनियों ने बॉन्ड बाजार से पैसा जुटाना कम कर दिया, क्योंकि वहां ब्याज दरें ऊंची थीं। विदेशी बाजार से कर्ज लेना भी महंगा हो गया, क्योंकि रुपये की कमजोरी और हेजिंग लागत ने इसे घाटे का सौदा बना दिया। ऐसे में बड़े कॉरपोरेट्स ने बैंकों का रुख किया। दूसरा, रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कटौती की, जिससे बैंक से कर्ज लेना सस्ता हो गया। इससे छोटे कारोबारियों और आम लोगों की मांग भी बढ़ी। गोल्ड लोन, व्हीकल लोन और MSME सेगमेंट पूरे साल सक्रिय रहे।
डिपॉजिट ग्रोथ पीछे क्यों रह गई?
जमा राशि में बढ़त 13.4 प्रतिशत रही, जो कर्ज की 16 प्रतिशत वृद्धि से कम है। यह फर्क बैंकिंग की एक पुरानी चुनौती को फिर से सामने लाता है। लोग अभी भी म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार या दूसरी जगह पैसा लगाना पसंद करते हैं, और बैंक जमा उनकी पहली पसंद हमेशा नहीं रहती। हालांकि FY26 में हालात थोड़े बदले और बाजार में उथलपुथल के कारण लोगों ने बैंक जमा में पैसा डालना शुरू किया। फिर भी जमा वृद्धि कर्ज वृद्धि की बराबरी नहीं कर पाई। बैंकों ने इस कमी को पूरा करने के लिए सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट यानी CD जैसे अल्पकालिक साधनों का सहारा लिया। FY26 की चौथी तिमाही में ही बैंकों ने 5.27 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की CDs जारी कीं, जो पिछले साल की इसी अवधि से करीब 30 प्रतिशत ज्यादा है।
मार्केट में उतार-चढ़ाव का असर
FY26 में शेयर बाजार में तेज गिरावट आई। सोने और चांदी में भी उतार-चढ़ाव रहा। कई म्यूचुअल फंड कैटेगरी में निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा। इन सबने मिलकर लोगों को बैंक जमा और बॉन्ड जैसी सुरक्षित जगहों की तरफ धकेला। यही वजह है कि मई 2024 के बाद पहली बार जमा वृद्धि इतनी तेज रही। बाजार की बेचैनी एक तरह से बैंकों के लिए वरदान साबित हुई, क्योंकि घबराए हुए निवेशक अपना पैसा बैंक की सुरक्षित छत के नीचे ले आए।
कॉरपोरेट और रिटेल लोन का ट्रेंड
FY26 में कॉरपोरेट कर्ज में अच्छी बढ़त देखी गई। सीमेंट, स्टील और एल्युमिनियम जैसे बुनियादी ढांचे से जुड़े क्षेत्रों में मांग मजबूत रही। MSME यानी छोटे और मध्यम स्तर के व्यापारियों के लिए कर्ज भी तेजी से बढ़ा, जिसमें डिजिटल तकनीक और सरकारी योजनाओं का बड़ा हाथ रहा। रिटेल सेगमेंट में होम लोन मजबूत रहा। गोल्ड लोन ने भी रफ्तार पकड़ी। हालांकि बिना गारंटी वाले पर्सनल लोन पर बैंक सतर्क रहे, लेकिन दूसरी छमाही में यहां भी धीरे-धीरे सुधार दिखा।
बैंकों के लिए आगे की चुनौती
जब कर्ज जमा से तेज रफ्तार से बढ़े, तो बैलेंस शीट पर दबाव पड़ना स्वाभाविक है। CD रेशो यानी कुल जमा में से कितना कर्ज दिया गया, वह एक समय 83 प्रतिशत के करीब पहुंच गया था, हालांकि साल के अंत में यह घटकर लगभग 81.44 प्रतिशत पर आया। बैंकों को ऊंची दरों पर CDs जारी करनी पड़ रही हैं, जिससे उनकी फंडिंग लागत बढ़ रही है। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो कर्ज सस्ता देने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। जमा बढ़ाने के लिए बैंकों को और ज्यादा मेहनत करनी होगी।
FY27 के लिए क्या उम्मीदें?
विशेषज्ञों का मानना है कि FY27 में बैंक कर्ज 13 से 14.5 प्रतिशत की दर से बढ़ सकता है, जबकि जमा वृद्धि 11 से 12 प्रतिशत रहने का अनुमान है। MSME और रिटेल सेगमेंट इस वृद्धि की अगुवाई करेंगे। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और वैश्विक व्यापार अनिश्चितता का असर भी नजर रखने योग्य होगा। रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में और कटौती की उम्मीद है, जो कर्ज मांग को और बल दे सकती है। लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि बैंक जमा जुटाने में कितने सफल रहते हैं।
निष्कर्ष:
FY26 भारतीय बैंकिंग के लिए एक मजबूत साल रहा, लेकिन आगे की राह आसान नहीं है। जमा और कर्ज के बीच बढ़ती यह दूरी अगर नहीं घटी, तो बैंकों के लिए आगे संतुलन बनाए रखना चुनौती बन सकता है।” जो बैंक जमा जुटाने में तेज होंगे, वही इस दौड़ में आगे निकलेंगे।